
15 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गए एक कड़े पत्र में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने केंद्र से आग्रह किया है कि राज्य में दशकों से रह रहे श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों के लिए पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकताओं को पूरी तरह से समाप्त किया जाए। लगभग 89,000 श्रीलंकाई तमिल 104 सरकारी शिविरों और शहरी बस्तियों में रहते हैं; इनमें से लगभग 40% भारत में जन्मे हैं और कभी श्रीलंका नहीं गए।
स्टालिन ने जिला कलेक्टरों को नागरिकता देने या कम से कम राज्य द्वारा पहले से सत्यापित पहचान दस्तावेजों के आधार पर दीर्घकालिक वीजा प्रदान करने का अधिकार देने का अनुरोध किया। उन्होंने गृह मंत्रालय के दिसंबर 2025 के आदेश पर भी स्पष्टता मांगी, जिसमें कुछ श्रीलंकाई तमिलों को विदेशी अधिनियम के तहत दंड से छूट दी गई है, क्योंकि स्थानीय पुलिस उन्हें अभी भी 'अवैध प्रवासी' मानती है।
यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो यह उन निवासियों के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक बाधा को दूर कर देगा, जिसने उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने, बैंक खाते खोलने और कल्याण योजनाओं का लाभ उठाने से रोका हुआ है। तमिलनाडु में उत्पादन केंद्र रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां कहती हैं कि नियमितीकरण से कानूनी कार्यबल बढ़ेगा और अनुपालन जांच आसान होगी, जबकि गैर-सरकारी संगठन कहते हैं कि इससे शिविर में जन्मे बच्चों को आधार नंबर और विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने में मदद मिलेगी।
प्रवासन कानून विशेषज्ञ बताते हैं कि संविधान संसद को नागरिकता पर विशेष अधिकार देता है, इसलिए किसी भी समग्र छूट के लिए केंद्र सरकार के कानून या 2025 के प्रवासन एवं विदेशी (छूट) आदेश के तहत विशेष अधिसूचना की आवश्यकता होगी। गृह मंत्रालय ने अभी तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन अधिकारी निजी तौर पर मानवीय पहलू और चुनावी वर्ष में राजनीतिक दबाव को स्वीकार करते हैं।
स्टालिन ने जिला कलेक्टरों को नागरिकता देने या कम से कम राज्य द्वारा पहले से सत्यापित पहचान दस्तावेजों के आधार पर दीर्घकालिक वीजा प्रदान करने का अधिकार देने का अनुरोध किया। उन्होंने गृह मंत्रालय के दिसंबर 2025 के आदेश पर भी स्पष्टता मांगी, जिसमें कुछ श्रीलंकाई तमिलों को विदेशी अधिनियम के तहत दंड से छूट दी गई है, क्योंकि स्थानीय पुलिस उन्हें अभी भी 'अवैध प्रवासी' मानती है।
यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो यह उन निवासियों के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक बाधा को दूर कर देगा, जिसने उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने, बैंक खाते खोलने और कल्याण योजनाओं का लाभ उठाने से रोका हुआ है। तमिलनाडु में उत्पादन केंद्र रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां कहती हैं कि नियमितीकरण से कानूनी कार्यबल बढ़ेगा और अनुपालन जांच आसान होगी, जबकि गैर-सरकारी संगठन कहते हैं कि इससे शिविर में जन्मे बच्चों को आधार नंबर और विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने में मदद मिलेगी।
प्रवासन कानून विशेषज्ञ बताते हैं कि संविधान संसद को नागरिकता पर विशेष अधिकार देता है, इसलिए किसी भी समग्र छूट के लिए केंद्र सरकार के कानून या 2025 के प्रवासन एवं विदेशी (छूट) आदेश के तहत विशेष अधिसूचना की आवश्यकता होगी। गृह मंत्रालय ने अभी तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन अधिकारी निजी तौर पर मानवीय पहलू और चुनावी वर्ष में राजनीतिक दबाव को स्वीकार करते हैं।
स्रोत: The Times of India