
पंजाब के जांच ब्यूरो ने 24 जुलाई को मानव तस्करी के एक मामले में एयर इंडिया के तीन कर्मचारियों और एआई एयरपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड के चार स्टाफ सदस्यों को दूसरी बार पूछताछ के लिए तलब किया है। यह मामला फर्जी डिजिटल इमिग्रेशन दस्तावेजों के इस्तेमाल से जुड़ा है। जांचकर्ताओं के अनुसार, 11 से 16 जनवरी के बीच 14 यात्रियों ने नकली यूके ई-वीजा स्क्रीनशॉट का उपयोग कर लंदन की उड़ान भरी और फिर शरण मांगने का दावा किया। हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा देखे गए विशेष जांच टीम के आंतरिक मेमो के मुताबिक, एयरलाइन के चेक-इन एजेंटों ने अनिवार्य ऑनलाइन वीजा सत्यापन को दरकिनार कर यात्रियों के फोन पर दिखाए गए चित्रों पर भरोसा किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने पहली उड़ान के लैंडिंग के बाद एयर इंडिया को सूचित किया, लेकिन पांच दिन बाद दूसरी उड़ान भी बिना जांच के निकल गई। यह मामला भारत की प्रमुख एयरलाइन के लिए बड़ा झटका है, खासकर तब जब वह निजीकरण के बाद अनुपालन प्रशिक्षण में भारी निवेश कर रही है। यदि लापरवाही साबित होती है, तो नागरिक उड्डयन महानिदेशक जुर्माना और अनिवार्य ऑडिट लगा सकते हैं, जिससे एयर इंडिया के नए बायोमेट्रिक बोर्डिंग कार्यक्रम की शुरुआत में देरी हो सकती है। कॉर्पोरेट मोबिलिटी के नजरिए से यह घटना याद दिलाती है कि दस्तावेज धोखाधड़ी के खिलाफ रक्षा की पहली पंक्ति केवल इमिग्रेशन अधिकारी नहीं, बल्कि एयरलाइन कर्मचारी भी होते हैं। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे भारतीय हवाई अड्डों से कर्मचारियों को स्थानांतरित करने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एयरलाइन कर्मियों के पास गंतव्य देश के वीजा सत्यापन पोर्टल तक पहुंच हो।
स्रोत: Hindustan Times